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Nazm by Ab Moqit



Sahar Ki Shabnam Raato Ka Siyah
Phool Khushbu Gulo Ki Ranginiya
Aab-o-hawa Har Mausam
Tanhai Mahfil Shaad-o-gum
Mar Mar Kar Ummed-e-hayaat
Hijr Ke Baad Visaal Ki Raat

Sab Ke Sab Aaye
Abhi Tak Tum Aaye Nahi!


Penned by
Ab Moqit
Dhanbad, Jharkhand, India 


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Raaz Dil Me Mere by Ab Moqit

Raaz dil me mere hasti ka hai, Jo kuch bhi hai dosti ka hai ! Aur to nhi kuch jahan me mera, Bas bachpan mere basti ka hai ! Yun hi gujar gaye barish to jana, Mausam kaghaz ki kashti ka hai ! Tere dam se raushan ye patthar, Tu jauhari jaise koi moti ka hai ! Mil kar hi tumse lagta hai dost, Ye umr abhi bhi masti ka hai ! Juda na kar zahid hame itne me, Ye khuda-parast wo but-parasti ka hai ! Har shaksh se milte hai is khayal se, Main hoon mitti ka wo bhi mitti ka hai ! Penned by Ab Moqit Dhanbad, Jharkhand, India    

ऐसी फसी उसकी डोर की तड़प कर रह गई by Chandan Singh

ऐसी फसी उसकी डोर की तड़प कर रह गई तारो से जो उलझी तो उलझ कर रह गई हवाएं चाहती थीं ले जाना साथ उसे पर उलझनों से घिरी वो सिसक कर रह गई ऐसी फसी उसकी डोर की तड़प कर रह गई। यूं तो उसकी कोई मंज़िल न थी उड़ती थी अकेली पर बेबस जिंदगी न थी मिली जब अपने जैसे ही किसी से तो उसकी फिर आज़ाद न जिंदगी रह गई। ऐसी फसी उसकी डोर की तड़प कर रह गई। भरोसा टूट गया डोर जब कटी आसमानों पर थिरकने वाली ज़मीं की ओर चली हवाओं ने सहारा दिया पर बात अब अलग थी जिस डोर से जुड़ी थी वो डोर कट चुकी थी लड़खड़ाती हुई अब बेसुध सी रह गई ऐसी फसी उसकी डोर की तड़प कर रह गई। तारो से जो उलझी तो उलझ कर रह गई। Penned by Chandan Singh New Seelampur, Delhi  

रूह का बंधन by Mohit Sah

तू जाग रहा रातों को अक्सर, माना प्रेम को पाना था पर क्या पूछा तुने है खुद से, क्या तू प्रेम दिवाना था? हाँ मान लिया जज्बात तेरे थे प्रेम प्रतिज्ञा में डूबे, पर क्या उन जज्बातों की नींव, सच्चाई का ज़माना था? खुश है ना तु मान गई वो, तुझको अपनाने को कर तैयारी देर नही अब, तुझको उसे भूलने को बस कुछ दिन इस प्रेम की अग्नि तुझको खूब जलाएगी फिर यूं हवस के शक्ल में प्रेम, खुद से ही रूठ जाएगी ना जाने संसार में कान्हा तेरा क्यों अवतरण हुआ? प्रेम सिखाने आया था न, लगता है न विफल हुआ जब रुह ने बंधन तोड़ दिया तब दो जिस्मों का मिलन हुआ एक रूह तो बाकी थी न उसमें जिसने उस फूल का सृजन किया जब रूह ने बंधन तोड़ दिया तब दो जिस्मों का मिलन हुआ हार गई है प्रेम तुम्हारी, तेरे हवस के चक्कर में टूट रहा है हर वह प्रेमी, तेरे छल के शक्कर में पर मानो छल तो बस अब, तेरे फितरत का हिस्सा है प्रेम बेचता गली - गली तु, अथक पुराना किस्सा है अब भी क्या अंतरमन तेरा, तुझको सही बताता है? प्रेम पुजारी प्रेम बेचता, शर्म ना तुझको आता है ना जाने क्यों, अब भी तुझको ना भूल अपना स्मरण हुआ जब रुह ने बंधन तोड़ दिया...